LAW'S VERDICT

नर्मदा नदी में रोज मिल रहा 98 मिलियन लीटर गंदा पानी, हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा जवाब


जबलपुर | 
नर्मदा नदी में हर रोज करीब 98 मिलियन लीटर गंदा और बिना ट्रीटमेंट का पानी डाले जाने के गंभीर आरोपों पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार सहित अन्य अनावेदकों से जवाब मांगा है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने जबलपुर निवासी अधिवक्ता विनिता आहूजा द्वारा दायर जनहित याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए नोटिस जारी करने के निर्देश दिए। बेंच ने इस मामले में अगली सुनवाई 17 फरवरी को तय की है। 

बिना ट्रीटमेंट सीवेज और औद्योगिक कचरा नर्मदा में

याचिका में आरोप लगाया गया है कि नगर निगम और संबंधित एजेंसियों की घोर लापरवाही के चलते शहर का सीवेज, नगर कचरा और औद्योगिक अपशिष्ट बिना किसी शोधन (ट्रीटमेंट) के सीधे नर्मदा नदी में डाला जा रहा है। इससे नदी के पानी में फीकल कोलीफॉर्म जैसे खतरनाक बैक्टीरिया पाए गए हैं, जो गंभीर बीमारियों का कारण बन सकते हैं।

नर्मदा मुख्य पेयजल स्रोत, फिर भी पानी दूषित

याचिका में बताया गया कि नर्मदा नदी जबलपुर शहर की मुख्य पेयजल स्रोत है, इसके बावजूद पानी की गुणवत्ता लगातार खराब होती जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार नदी व उसकी सहायक नदियों में पीएच स्तर 8.5 से अधिक पाया गया है, जिससे पानी क्षारीय और स्वास्थ्य के लिए अनुपयुक्त हो रहा है।

36.7% सैंपल असुरक्षित, इंदौर की घटना का हवाला

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य संघी ने डिवीज़न बेंच को बताया कि जल जीवन मिशन की जांच में ग्रामीण क्षेत्रों के 36.7 प्रतिशत पेयजल सैंपल असुरक्षित पाए गए। वहीं हाल ही में इंदौर में दूषित पानी से फैले डायरिया के प्रकोप में 10 लोगों की मौत और 150 से अधिक के अस्पताल में भर्ती होने का हवाला देते हुए प्रशासनिक लापरवाही पर सवाल उठाए गए।

प्रदूषण रोकने ठोस निर्देश दिए जाएँ 

याचिका में हाईकोर्ट से मांग की गई है कि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) को अनिवार्य रूप से संचालित कराया जाए। नर्मदा में प्रदूषण रोकने के ठोस निर्देश दिए जाएं। जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो और नर्मदा नदी की वास्तविक स्थिति को बहाल किया जाए।


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